कर दूं कैसे समर्पण ,अनैतिकता के ठाठो को
कैसे जाऊं भूल ,नैतिकता के पाठो को
ज्ञान होकर भी अज्ञानी ,अपने हितों को साध रहे
पीस रहे हैं बैल कोल्हू के, जीवन में ना स्वाद रहे
ना प्रेम रहा
ना विचार रहे
बस मौन होकर ,अत्याचार सहे
सद्भावना की आड़ में ,जाने कितनी सड़ांध बहे
झूठो की रगों में ,झूठ का ही राग बहे
उस पर अकड़ इतनी, खुद को कामयाब कहे
ज्ञान होकर भी अज्ञानी, अपने हितों को साध रहे
पीस रहे हैं बैल कोल्हू के ,जीवन में ना स्वाद रहे
कर दूं कैसे समर्पण ,अनैतिकता के ठाठो को
कैसे जाऊं भूल ,नैतिकता के पाठो को.
✍️ SANJAY KUMAR RATHI