रिवाजो की सुलीया चढ़े क्यों रात दिन
वसूलो की बेड़िया पड़े क्यों रात दिन
मुश्किल भरे मटके सर पर ढोए भरी दुपेहरी
वो जाए कहा जिसको घर भी लगे कचेहरी
जन्नत है आंखे तो क्यों गम भर आए
क्यों करे इंतज़ार उसका जो उम्र भर ना आए
मुद्दत से बस एक पल खोजे दिल
जाने दबा है किसके बोझे दिल
जरूरतों का पहाड़ खोद कर कहा जाए
ऐसा ना हो कही ये पल भी बह जाए
समेटे कैसे बाँहों मे दुनिया सारी
जो कल थी प्यास मेरी वो आज है तुम्हारी