मेरे बारे में

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

प्यास

रिवाजो की सुलीया चढ़े क्यों रात दिन
वसूलो की बेड़िया पड़े क्यों रात दिन

मुश्किल भरे मटके सर पर ढोए भरी दुपेहरी
वो जाए कहा जिसको घर भी लगे कचेहरी

जन्नत है आंखे तो क्यों गम भर आए
क्यों करे इंतज़ार उसका जो उम्र भर ना आए

मुद्दत से बस एक पल खोजे दिल
जाने दबा है किसके बोझे दिल

जरूरतों का पहाड़ खोद कर कहा जाए
ऐसा ना हो कही ये पल भी बह जाए

समेटे कैसे बाँहों मे दुनिया सारी
जो कल थी प्यास मेरी वो आज है तुम्हारी