मेरे बारे में

बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

मैदान

 चिंदी मिली दर्ज़ी हुऐ भगत मिले भगवान

कभी छाेड कुर्सी आना ताे यजमान


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म्यान के भराैसे लड़ने वालाे 

तलवार की धार से डरने वालाे

कभी हाे हिम्मत ताे मैदान आना


मैमनाै की कर सवारी सवार हुऐ

मुर्खाे मैं बैठकर  होशियार हुऐ

अपनी चारदीवारी मैं जाबांज  हुऐ


फुलकर ग़ुब्बारे हवाई जहाज़ हुऐ

कभी हाे हाैसला ताे छलाँग लगाना

कुऐ से बाहर आना


तलवार की धार से डरने वालाे

म्यान के भराैसे लड़ने वालाे 

कभी हाे हिम्मत ताे मैदान आना


**÷÷SANJAY KUMAR RATHI÷÷**


पिंजरा

दवा पानी और सुरक्षा पिंजरे की दिवाराे में 

दासाे का जीवन गुज़रा हमेशा तहखानाे में 


कभी जाे टांगा खुटी पर पहुँचे आँसमानाे में 

नज़र टिकी थी फिर भी मुफ़्त के दानाे में 


कैसा क्षितिज कैसे पंख सब से अनजान हुएे

बंद रहे पिजरे में लेकिन फिर भी हम महान हुएे


जद्दोजहद से छुटा पिन्ड चाहे जितने लाचार हुएे

देखमदेखी काँठ का उल्लु सारा बाज़ार हुएे


दवा पानी और सुरक्षा पिंजरे की दिवाराे में 

दासाे का जीवन गुज़रा हमेशा तहखानाे में 


**-** SANJAY KUMAR RATHI **-**

शय और मात

 क्षमताओ का आकाश विषम गहरा है


याेग्यताओ के प्रकाश पर पहरा है


तब तक ही है सड़न आेर काई


जब तक मन का पानी ठहरा है


एक सी क़दकाठी एक सा चेहरा है


उस पर बाँधा सबने सेहरा है


तब तक ही है शय और मात


जब तक घात और माेहरा है


**÷÷SANJAY KUMAR RATHI÷÷**


ज़िन्दगी

बदल देंगे ज़रूरतें बदल देंगे हिजाब

बस एक बार आ जाऐ समझ में 

ज़िन्दगी तेरा हिसाब


रात काे दिन करे दिन काे रात

उाढे है ज़िन्दगी राेज नया नक़ाब 


बने उजड़े सँवरे बरबाद

बड़े ठग निकले ये ख़्वाब 


बदल देंगे ज़रूरतें बदल देंगे हिजाब

बस एक बार आ जाऐ समझ में 

ज़िन्दगी तेरा हिसाब



**÷÷SANJAY KUMAR RATHI÷÷**


तेरा चेहरा

वाे धुल भरी राते बरसात तेरा चेहरा

तुम ना आऐ ताे क्या

मेरे साथ तेरा चेहरा


देता है जेसे दुआऐ

हसिन ख़्वाब तेरा चेहरा


कभी बना चाँद 

कभी आफ़ताब तेरा चेहरा


कभी तुझे जानु पल-पल

कभी गहरा राज तेरा चेहरा


वाे धुल भरी राते बरसात तेरा चेहरा

तुम ना आऐ ताे क्या

मेरे साथ तेरा चेहरा


**÷÷SANJAY KUMAR RATHI÷÷**




कर्म

कर्म किए वह भरने होंगे

फिर नए कर्म करने होंगे


कभी उड़ेंगे रंग जीवन के कभी नए रंग भरने होंगे

मेरा तेरा कुछ नहीं जग में कभी सभी अपने कभी सभी पराए


एक पल में बन जाए बादशाह एक पल में भिखारी नजर आए


सपनों की उड़ान बड़ी गहरी कभी सुबह कभी कड़ी दुपहरी


कुछ जीने कुछ मरने होंगे

कभी उड़ेंगे रंग जीवन के कभी नए रंग भरने होंगे

**÷÷SANJAY KUMAR RATHI÷÷**

* ये कविता सिर्फ़ क़र्ज़दारों के लिए लागु है

तिलाे में अब तेल नहीं तुम्हारे

बस तुम नाैकरी बजातै हाे 


साहब कहते दिन रात काे

तुम भी दिन बतलाते हाे


तन्खाह पुरे बारह लाख

पर रुखी सुखी खाते हाे


तिलाे में अब तेल नहीं तुम्हारे

बस तुम नाैकरी बजातै हाे 


किस्त में जीते पुरे साल

पुरे साल किस्त चुकाते हाे


साहब कहते दिन रात काे

तुम भी दिन बतलाते हाे


जिसकाे जाे भी कहना हाे

कह ले


पर तुम ताे बटर लगाते हाे

तिलाे में अब तेल नहीं तुम्हारे


बस तुम नाैकरी बचातै हाे


**÷÷SANJAY KUMAR RATHI÷÷**



मन दर्पण

 मन दर्पण सब जाने है भले बुरे का भेद

किसके लिए विष भरा किसके लिए खेद


डुबकी लगाएे बारम्बार जाता नहीं विकार

साेच बदले ताे शायद बदल जाएे संसार


सबकी अपनी धुनी है सबके अपने भगवान

जी लाे आैर चार दिन फिर मिट्टी मिलेंगे प्राण


अजर काेई रहा नहीं क्या गुण क्या दाेष

लाख भेष बदले चाहे घमंड आेर राैष


दाैड रहे सब कहा कैसी अंधी दाैड

पिस रहे खुद आगे बढने की हाैढ


राम रावण सब मरे कभी वध कभी निर्वाण

जग में बस रह गया शब्द केवल नाम


****SANJAY KUMAR RATHI****

मैं पूछता हूं

 मैं पूछता हूं इन दर ओ दिवारों से

कभी तो बाहर निकलो बंद दरवाजों से 

तराशो खुद को खुद का खुदा हो जाओ 

निकलो बुतों से जुदा हो जाओ

रंग-बिरंगे आसमानों से 

मिलाओ तो नजर मैदान से 

फरमानो से एहसानों से 

दबे पड़े हो क्यों सामानों से  

निकलो बुतों से जुदा हो जाओ

तराशो खुद को खुद का खुदा हो जाओ

कभी तो बाहर निकलो बंद दरवाजों से

मैं पूछता हूं इन दर ओ दिवारों से

शहरों से खलियानो से

निकालो खुद को म्यानो से

रंग-बिरंगे आसमानों से

मिलाओ तो नजर  मैदानों से

  ****SANJAY KUMAR RATHI****


एक हाथ में रख लो मक्खन एक हाथ में चुना

 एक हाथ में रख लो मक्खन एक हाथ में चुना

 फिर देखो बढ़ता जाए बैंक बैलेंस दिन दूना 


काम आए तो सरका दो आगे 

इनाम आए तो 

मैं हूं ना ...  मैं हूं ना .....  मैं हूं ना ... मैं हूं ना...


जोड़-तोड़ करके कैसे भी अपनी जुगत बिठाओ

जो दिखे ज्ञानी ज्यादा उसको पहले उड़ाओ


बन जाओ किसी के जीजा किसी के साले बन जाओ

काम आए ना आए लेकिन  गा गा कर चिल्लाओ


एक हाथ में रख लो मक्खन एक हाथ में चुना

फिर देखो बढ़ता जाए बैंक बैलेंस दिन दूना 

काम आए तो सरका दो आगे 

इनाम आए तो 

मैं हूं ना .....  मैं हूं ना  .....  मैं हूं ना. .... मैं हूं ना.....

  ****SANJAY KUMAR RATHI****

वीर

  वीरों के भी ,वीर है हम

 कभी भाले कभी ,तीर हैं हम

 लड़ेंगे कब तक, दम है जब तक 

दुश्मन चाकू ,शमशीर है हम

 काटो वाली ,जंजीर है हम

पार करेंगे ,घनघोर घटाएं 

दुश्मन जैसे ,कच्ची लताएं 

कभी भाले ,कभी तीर हैं हम

वीरों के भी ,वीर है हम

काटो वाली ,जंजीर है हम

सर को कटवाए, या के काट के लाए

लड़ेंगे कब तक, दम है जब तक 

 दुश्मन की लाशों से ,श्मशान पटाए

कभी भाले, कभी तीर हैं हम

वीरों के भी, वीर है हम

****SANJAY KUMAR RATHI****

हिन्दुस्ता

 हिन्दुस्ता तेरा है , मेरा है

ये  दिल है धड़कन है रोज नया  सवेरा है 

सबकी आशा सबकी भाषा 

लिखता रोज नई परिभाषा

विषमता में एकता का डेरा है 

रोज नया सवेरा है 

हिन्दुस्ता तेरा है ,मेरा है

रहमत है आदत है चाहत है

तेरी मिट्टी मेरी इबादत है

जैसे बगीचा कोई घनेरा है

तेरा है ,मेरा है ,तेरा है, मेरा है

हिन्दुस्ता, हिन्दुस्ता, हिन्दुस्ता

रोज नया सवेरा है


****SANJAY KUMAR RATHI****

                      

वस्तुऐ

       होती द्रवित, करती अभिलाषा

       मनाती मुझको, मेरे रूठने पर 

       टूट जाती, मेरे टूटने पर

       वस्तुऐ करती प्रेम अगर मुझसे

       मुझ जैसा


       सुनती, बोलती , समझती भाषा 

       हंसाती, रुलाती, देती दिलासा

       वस्तुऐ करती प्रेम अगर मुझसे

       मुझ जैसा


       व्यक्त, अव्यक्त, दिखाती संवेदना

       करती विचलित , मेरी वेदना

       वस्तुऐ करती प्रेम अगर मुझसे

        मुझ जैसा.


****  SANJAY KUMAR RATHI. ****

नहीं चाहिए

 नहीं चाहिए वैभव उन जैसा

जिनका बल निर्बल  बिन वैभव


नहीं चाहिए तन उन जैसा

जिनका मन कलंकित संग पावक


 नहीं चाहिए  कीर्ति उन जैसी

जिनका अधर्म रहा सहायक


 नहीं चाहिए धर्म उन जैसा

जिनकी सोच रही भयावक.


****SANJAY KUMAR RATHI****

तेरे कहने से क्या ?

जीवन मरन का चरण पाप पुन्य का भ्रम धाेएगा

तेरे कहने से क्या, जाे हाेना है वही हाेएगा


फटेगी धरती, लावे का सैलाब लिए

गिरेगा आँसमा ,जा़र-जार अाफताब लिए

ताराे का हस्र हाेगा ,मिट्टी में मिली राख सा


सहसा ,परत दर परत ,उभरेंगे भाव घाव लिए

कर्म बनेंगे पतवार ,पहाड़ सी नाव लिए


दहकेगी देह, अग्नि सागर सा पान किए

आेर पिघलेगी हड्डियाँ, मन में पछताव लिए


डुबे या पार लगे ,पुनवुर्ति करनी हाेगी

समय सारणी अचुक, करनी भरनी हाेगी


गरल देगा सुख ,जख्माे से फूटती पीप से

अपने अंग काट ,ख़ुद ख़ुद में स्वाहा हाेगा


धर्म मिटेगा, भ्रर्म मिटेगा ,मिट जाएगा अभिमान


जीवन मरन का चरण, पाप पुन्य का भ्रम धाेएगा

तेरे कहने से क्या ,जाे हाेना है वही हाेएगा


**-** SANJAY KUMAR RATHI **-**