मन दर्पण सब जाने है भले बुरे का भेद
किसके लिए विष भरा किसके लिए खेद
डुबकी लगाएे बारम्बार जाता नहीं विकार
साेच बदले ताे शायद बदल जाएे संसार
सबकी अपनी धुनी है सबके अपने भगवान
जी लाे आैर चार दिन फिर मिट्टी मिलेंगे प्राण
अजर काेई रहा नहीं क्या गुण क्या दाेष
लाख भेष बदले चाहे घमंड आेर राैष
दाैड रहे सब कहा कैसी अंधी दाैड
पिस रहे खुद आगे बढने की हाैढ
राम रावण सब मरे कभी वध कभी निर्वाण
जग में बस रह गया शब्द केवल नाम
****SANJAY KUMAR RATHI****