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बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

मन दर्पण

 मन दर्पण सब जाने है भले बुरे का भेद

किसके लिए विष भरा किसके लिए खेद


डुबकी लगाएे बारम्बार जाता नहीं विकार

साेच बदले ताे शायद बदल जाएे संसार


सबकी अपनी धुनी है सबके अपने भगवान

जी लाे आैर चार दिन फिर मिट्टी मिलेंगे प्राण


अजर काेई रहा नहीं क्या गुण क्या दाेष

लाख भेष बदले चाहे घमंड आेर राैष


दाैड रहे सब कहा कैसी अंधी दाैड

पिस रहे खुद आगे बढने की हाैढ


राम रावण सब मरे कभी वध कभी निर्वाण

जग में बस रह गया शब्द केवल नाम


****SANJAY KUMAR RATHI****