जीवन मरन का चरण पाप पुन्य का भ्रम धाेएगा
तेरे कहने से क्या, जाे हाेना है वही हाेएगा
फटेगी धरती, लावे का सैलाब लिए
गिरेगा आँसमा ,जा़र-जार अाफताब लिए
ताराे का हस्र हाेगा ,मिट्टी में मिली राख सा
सहसा ,परत दर परत ,उभरेंगे भाव घाव लिए
कर्म बनेंगे पतवार ,पहाड़ सी नाव लिए
दहकेगी देह, अग्नि सागर सा पान किए
आेर पिघलेगी हड्डियाँ, मन में पछताव लिए
डुबे या पार लगे ,पुनवुर्ति करनी हाेगी
समय सारणी अचुक, करनी भरनी हाेगी
गरल देगा सुख ,जख्माे से फूटती पीप से
अपने अंग काट ,ख़ुद ख़ुद में स्वाहा हाेगा
धर्म मिटेगा, भ्रर्म मिटेगा ,मिट जाएगा अभिमान
जीवन मरन का चरण, पाप पुन्य का भ्रम धाेएगा
तेरे कहने से क्या ,जाे हाेना है वही हाेएगा
**-** SANJAY KUMAR RATHI **-**