*हाथो की लकीरे खुद ही कैसे मिटाइए ,जो ना समझे पीर दिल की उससे दिल क्या लगाइए *
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जब से चला था , तब से छला था
जला था ...जला था ...
दिल जला था ....दिल जला था .....
जाने किस किस के दर झुका मुसाफिर, जाने किस किस के घर रुका मुसाफिर
खला था ....सबको ....खला था .....
जब से चला था, तब से छला था
जला था ...जला था ...
दिल जला था ....दिल जला था .....
चाहत भतेरी मन नहीं भरती, जाऊ कहा कम पड गई धरती
गला था ...गला था ...
अश्को से तेरे दिल गला था....
जब से चला था, तब से छला था
जला था ...जला था ...
दिल जला था ....दिल जला था .....
जब से चला था , तब से छला था
जला था ...जला था ...
दिल जला था ....दिल जला था .....
जाने किस किस के दर झुका मुसाफिर, जाने किस किस के घर रुका मुसाफिर
खला था ....सबको ....खला था .....
जब से चला था, तब से छला था
जला था ...जला था ...
दिल जला था ....दिल जला था .....
चाहत भतेरी मन नहीं भरती, जाऊ कहा कम पड गई धरती
गला था ...गला था ...
अश्को से तेरे दिल गला था....
जब से चला था, तब से छला था
जला था ...जला था ...
दिल जला था ....दिल जला था .....
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Sanjay Kumar Rathi