करता है क्यों मन विभाजित श्रापित सपनो के मंथन से
कभी तो निकलेगा दुवेश क्लेश के बंधन से
प्रयत्न से कटेगे कष्ट ,कष्ट से अनुभव होगा
मन सभाल ले रे फकीरा फिर हर शिखर पर ध्वज होगा
रण होगा या के वन होगा जाने कहा गमन होगा
चलता ही चल मुसफ़िर कही तो परचम होगा
प्रयत्न से कटेगे कष्ट ,कष्ट से अनुभव होगा
आंधियो मे रास्ते होगे या रास्तो मे आंधिया
रुकना नहीं पल भर भी कभी
कभी तो अंत होगा
करता है क्यों मन विभाजित श्रापित सपनो के मंथन से
कभी तो निकलेगा दुवेश क्लेश के बंधन से
कभी तो निकलेगा दुवेश क्लेश के बंधन से
प्रयत्न से कटेगे कष्ट ,कष्ट से अनुभव होगा
मन सभाल ले रे फकीरा फिर हर शिखर पर ध्वज होगा
रण होगा या के वन होगा जाने कहा गमन होगा
चलता ही चल मुसफ़िर कही तो परचम होगा
प्रयत्न से कटेगे कष्ट ,कष्ट से अनुभव होगा
आंधियो मे रास्ते होगे या रास्तो मे आंधिया
रुकना नहीं पल भर भी कभी
कभी तो अंत होगा
करता है क्यों मन विभाजित श्रापित सपनो के मंथन से
कभी तो निकलेगा दुवेश क्लेश के बंधन से