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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

मन मंथन

करता है क्यों मन विभाजित श्रापित सपनो के मंथन से
कभी तो निकलेगा दुवेश क्लेश के बंधन से

प्रयत्न से कटेगे कष्ट ,कष्ट से अनुभव होगा

मन सभाल ले रे फकीरा  फिर हर शिखर पर ध्वज होगा

रण होगा या के वन होगा जाने कहा गमन होगा

चलता ही चल मुसफ़िर कही तो परचम होगा
प्रयत्न से कटेगे कष्ट ,कष्ट से अनुभव होगा

आंधियो मे रास्ते होगे या रास्तो मे आंधिया

रुकना नहीं  पल भर भी कभी
कभी तो अंत होगा
करता है क्यों मन विभाजित श्रापित सपनो के मंथन से
कभी तो निकलेगा दुवेश क्लेश के बंधन से

**Sanjay Kumar Rathi**