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सोमवार, 17 जनवरी 2011

कुदरत

ऐ कुदरत तुने क्यों खताओ का अम्बार दिया है
जीने को तो जिया दिन हज़ार
मगर क्या कभी हिसाब दिया है
तुने ही पैदा किये थे सवाल
क्यों इनको मार दिया है
दिया भी तो सिर्फ ईमान
उसको भी उधार दिया है
कैसे राह पर रहेगे
कदम सलामत
जब तुने जमी को ही
उखाड़ दिया है
ऐ कुदरत तुने क्यों खताओ का अम्बार दिया है
जीने को तो जिया दिन हज़ार
मगर क्या कभी हिसाब दिया है
जलाऊ किसके घर
मुराद के दीये
तुने तिनको को भी
उजाड़ दिया है
कहूँ गुनेहगार किसको
तुने ही तो
गिरेबा को फाड़ दिया है
करु  कैसे सजदा तेरा
जब तुने इश्क को
नाम गुनाह दिया है
ऐ कुदरत तुने क्यों खताओ का अम्बार दिया है
जीने को तो जिया दिन हज़ार
मगर क्या कभी हिसाब दिया है