क्यों तुने ये सोने के छत्र बनाए है
क्या कभी
झूठे बेर खाए है
अपने ही नाम की
लगाई है डुबकी
क्या कभी
संतो के पैर दबाए है
काटता है लकीरे
पढता है पौंथिया
क्या कभी
भूखो के घर
चूलेह जलाए है
करता है दान
बनकर दानवीर
क्या कभी
अपाहिज परिंदों के
पर लगाए है
क्यों तुने ये सोने के छत्र बनाए है
क्या कभी
झूठे बेर खाए है
रोज चढ़ता है
नई सीढियाँ
क्या कभी
क्या कभी
झूठे बेर खाए है
अपने ही नाम की
लगाई है डुबकी
क्या कभी
संतो के पैर दबाए है
काटता है लकीरे
पढता है पौंथिया
क्या कभी
भूखो के घर
चूलेह जलाए है
करता है दान
बनकर दानवीर
क्या कभी
अपाहिज परिंदों के
पर लगाए है
क्यों तुने ये सोने के छत्र बनाए है
क्या कभी
झूठे बेर खाए है
रोज चढ़ता है
नई सीढियाँ
क्या कभी
पीढ़ियों के
भ्रम मिटाए है
अपनी ही जय के
जो नारे लगाए है
क्या कभी
मरुस्थल मे फूल उगाए है
अपने ही नाम की
लगाई है डुबकी
क्या कभी
संतो के पैर दबाए है
भ्रम मिटाए है
अपनी ही जय के
जो नारे लगाए है
क्या कभी
मरुस्थल मे फूल उगाए है
अपने ही नाम की
लगाई है डुबकी
क्या कभी
संतो के पैर दबाए है