रोज बने नया फ़साना
कलम की तलहटी मे
तारो को छुना
समंदर को पी जाना
उड़ना बिन पंखो के
छितिज़ नया पाना
कलम की तलहटी मे
कभी हसाना कभी रुलाना
कभी खुद को भूल जाना
कलम की तलहटी मे
कभी चुभाना फूलो को
कभी काँटों को सजाना
कभी उदय करना सूरज
कभी चाँद को डुबाना
रोज बने नया फ़साना
कलम की तलहटी मे
कभी खोलना मुट्ठिया
कभी पलकों को झुकाना
कभी करना तोबा
कभी मयखाना
कभी बिछाना शतरंज
कभी गुलाल उडाना
रोज बने नया फ़साना
कलम की तलहटी मे
Sanjay Kumar Rathi