ह्रदय गरल उतार रहा हूँ नभो के पाले मे
शुधाक्षीर उबाल रहा हूँ रातो के उजालो मे
तपती धरा के अधरों पर रुककर
सागर उधाड रहा हूँ मय के प्यालो मे
भजंगो के दुवंद मे फसकर
घटाओ के कुर्दन मे हँसकर
समय तेरे व्यूह मे भटक कर
हकुमते सभाल रहा हूँ वीराने मे
आशाओ को झटक कर
दर-दर सर पटक कर
मन पीर उछाल रहा हूँ तोहमत खाने मे