मेरे बारे में

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

दिल जला था ....

*हाथो की लकीरे खुद ही कैसे मिटाइए ,जो ना समझे पीर दिल की उससे दिल क्या लगाइए *
**********
जब से चला था , तब से छला था
जला था ...जला था ...
दिल जला था ....दिल जला था .....
जाने किस किस के दर झुका मुसाफिर, जाने किस किस के घर रुका मुसाफिर
खला था ....सबको ....खला था .....

जब से चला था, तब से छला था
जला था ...जला था ...
दिल जला था ....दिल जला था .....

चाहत भतेरी मन नहीं भरती, जाऊ कहा कम पड गई धरती
गला था ...गला था ...
अश्को से तेरे दिल गला था....

जब से चला था, तब से छला था
जला था ...जला था ...
दिल जला था ....दिल जला था .....
*******
Sanjay Kumar Rathi

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

मन मंथन

करता है क्यों मन विभाजित श्रापित सपनो के मंथन से
कभी तो निकलेगा दुवेश क्लेश के बंधन से

प्रयत्न से कटेगे कष्ट ,कष्ट से अनुभव होगा

मन सभाल ले रे फकीरा  फिर हर शिखर पर ध्वज होगा

रण होगा या के वन होगा जाने कहा गमन होगा

चलता ही चल मुसफ़िर कही तो परचम होगा
प्रयत्न से कटेगे कष्ट ,कष्ट से अनुभव होगा

आंधियो मे रास्ते होगे या रास्तो मे आंधिया

रुकना नहीं  पल भर भी कभी
कभी तो अंत होगा
करता है क्यों मन विभाजित श्रापित सपनो के मंथन से
कभी तो निकलेगा दुवेश क्लेश के बंधन से

**Sanjay Kumar Rathi**


मन बंधन

मन बंधन के तोड़ दे ताले
जाने किस ताल खिले उजाले
चल गर्दिश को दे भुला
थोडा  होश तो
संभाले ...

चलती नाव मे कील क्यों ठोके

जब दिखने लगे किनारे
चल रातो मे रंग भर दे
फूलो मे भरे उजाले....

जाने किस के मन  मे क्या है

किस से अब क्या मांगे
चल थोडा सा शर्बत बाटे
खोले बंदिश के धागे..

मन बंधन के तोड़ दे ताले
जाने किस ताल खिले उजाले...
**Sanjay Kumar Rathi**




सोमवार, 9 जनवरी 2012

जय भारती

हमने कहा तो उग्रवाद
तुमने कहा तो क्रांति
सफ़ेद लिबादे मे बंद है
जाने कितनी भ्रान्ति

मारा गया था जो वो था बेगुनाह
गुनाहगारो के है सियासत्दार सारथी
किसानो के घर अन्न नहीं
चोरो की नोटों से उतरे आरती

अभी कल ही तो लुटी थी उन्होंने इज्जत
जो आज आगे खड़े होकर बोल रहे है
जय भारती जय भारती
**Sanjay Kumar Rathi**