मेरे बारे में

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

मोरे पिया

मन बदला
मन बदल गया
मोरे पिया तू क्यों छल गया
राते काली कटती ना थी
तू दिन भी काले कर गया

मन बदला
मन बदल गया
मोरे पिया, तू क्यों छल गया
किसको तकेगे, अब ये नैना
सुनी थी राहे, तू दिल भी सूना कर गया

मन बदला
मन बदल गया........

बद्लेगे लोग, बदलेगा मौसम
मै कैसे बदलू,  तू चोराहे पे धर गया
मन बदला
मन बदल गया
मोरे पिया, तू क्यों छल गया




पीड़ा

अब ना मिटेगी ये पीड़ा इश्क तेरा क्या इलाज

सोने की नगरी चाँदी के गाव जन्नत भी छोटी बड़ा अलगाव
रेशम का बिस्तर तारो की छाव मधु का प्याला भरे ना घाव
यादो के तीर भरे विषाद अश्को से निकले फरियाद

अब ना मिटेगी ये पीड़ा इश्क तेरा क्या इलाज

सपनो  का धुँआ  जहन  बंजर
रोज दिल  काटे नयन खंजर
कैसे भरे अब इस बुत मे प्राण
जलाए रूह या जलाए निशान
अब ना मिटेगी ये पीड़ा इश्क तेरा क्या इलाज

एहसास

अम्बर विशाल तडपता है धरती को
रोता है चिघाड़ कर देख कर अपनी शक्ति को
वसुंधरा फिर भी आसुओ को खुद मे समां लेती है
 कहती है बारम्बार
ना मिल सके हम तो क्या है
फिर भी हम ये दिव्य सन्देश देगे 
 देख लेना छितिज  पर ना मिल कर भी
 हम मिल जाते है
कितनी भी कोशिश कर ले दुनिया
फिर भी हम एक नज़र आते है 
मिलाता है इन्द्रधनुष जमी आकाश को
मरने ना देगे हम प्यार के एहसास को

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

रूठना

रूठना तो महोबत की अदा पुरानी है सनम
कुछ ना कहूँगा मै
यही खता निभानी है सनम
जिक्र ना करूँगा तेरा फूलो से भी कभी
मुझको काटो से वफ़ा निभानी है सनम
बस जाओ तुम गैरो की बाहों मे तो क्या
मुझको तो ख्वाबो की दुनिया सजानी है सनम 


रविवार, 18 दिसंबर 2011

बदलाव

गिरगिट सपने वर्ण बदले
उधडे मन कैसे संभले
तलवारों की एक कहानी
म्यान बदले या मैदान बदले
मैंने तो  रंग  फेका है मुठी भर - भर
अब जमी बदले या आसमान बदले 


खारे दरिया पहचान बदले
लड़खड़ाते कदम ईमान बदले
गुफ्तगू तो होगी मेरे रुतबे की कभी
चाहे जाम बदले या पैगाम बदले
मैंने तो ढंग समेटा है  व्योम भर-भर
अब दाम बदले या इल्जाम बदले 

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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

मुर्ग्त्रुष्णा

विषय का बोध हो कैसे
जब योगनिया ही अतृप्त है
और कैसे जागे जमीर
जब इच्छा ही सुप्त है
विलुप्त है विलुप्त है
मन की डोर विलुप्त है
अपने पैर पसार  रहा
अँधेरा आक्रोश से
क्या मिट पाएगा
थोड़े से संतोष से
कागज़ मे शयाही
जाने क्या क्या गुल खिलाएगी
क्या तेरे जगाने से मेरी
मुर्ग्त्रुष्णा मर जाएगी
साधनों को साधने से
मन संधेगा कैसे
दोगे मयखाना फकीर को
क्या वो बंधेगा ऐसे

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

प्यास

रिवाजो की सुलीया चढ़े क्यों रात दिन
वसूलो की बेड़िया पड़े क्यों रात दिन

मुश्किल भरे मटके सर पर ढोए भरी दुपेहरी
वो जाए कहा जिसको घर भी लगे कचेहरी

जन्नत है आंखे तो क्यों गम भर आए
क्यों करे इंतज़ार उसका जो उम्र भर ना आए

मुद्दत से बस एक पल खोजे दिल
जाने दबा है किसके बोझे दिल

जरूरतों का पहाड़ खोद कर कहा जाए
ऐसा ना हो कही ये पल भी बह जाए

समेटे कैसे बाँहों मे दुनिया सारी
जो कल थी प्यास मेरी वो आज है तुम्हारी 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

गुजारिश

बीते लम्हों की गुजारिश जाने क्या कह जाती है
तेरी हर एक आह नजरो से बह जाती है
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सहेजा है दिल मे जाने कितने तुफानो को
मसला है ना जाने कितने अरमानो को

बहता है दरिया मेरी चोखट पर
फिर क्यों जाऊ दूर नहाने को

उठा कर हाथ आकाश छुने दो
मैंने कब कहा तारे नाप लाने को

खुशबू बहुत है गुलिश्ता मे तेरे
कभी आओ मेरे घर भी शकर खाने को

कट तो जाता है दिन बिन तेरे
फिर क्यों आता है चाँद दिल जलाने को

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

राहे

चौराहे जिंदिगी के हर मौड़ पे खड़े है
बहुत है भीड़ वहा जहा कदम पड़े है
गिर तो जाता कब का
मगर क्या करू होसले बड़े है
बस यही अरमा
अब दिल में चढ़े है
चलते ही जाना
कदम बढे तो कदम बढे है
कहो तो कहो
मधहोश मुझे
ये सरुर जब चढ़े है
तो बस चढ़े  है
रोकेगा कौन रफ़्तार तेरी
जब रास्ते तुने खुद ही जड़े है
खोल कर तो देख
राहे तेरी
चलने से पहले मंजिल पड़े है

सोमवार, 17 जनवरी 2011

कुदरत

ऐ कुदरत तुने क्यों खताओ का अम्बार दिया है
जीने को तो जिया दिन हज़ार
मगर क्या कभी हिसाब दिया है
तुने ही पैदा किये थे सवाल
क्यों इनको मार दिया है
दिया भी तो सिर्फ ईमान
उसको भी उधार दिया है
कैसे राह पर रहेगे
कदम सलामत
जब तुने जमी को ही
उखाड़ दिया है
ऐ कुदरत तुने क्यों खताओ का अम्बार दिया है
जीने को तो जिया दिन हज़ार
मगर क्या कभी हिसाब दिया है
जलाऊ किसके घर
मुराद के दीये
तुने तिनको को भी
उजाड़ दिया है
कहूँ गुनेहगार किसको
तुने ही तो
गिरेबा को फाड़ दिया है
करु  कैसे सजदा तेरा
जब तुने इश्क को
नाम गुनाह दिया है
ऐ कुदरत तुने क्यों खताओ का अम्बार दिया है
जीने को तो जिया दिन हज़ार
मगर क्या कभी हिसाब दिया है

रविवार, 16 जनवरी 2011

ख़ाक

दावते इमान उड़ाई रात भर
चिलम पे  चिलम जलाई रात भर
मुझको क्या मालूम
मेरी मदहोशी का आलम
खुद की ही ख़ाक उड़ाई रात भर

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

मोती चुगावा

कॉवा वे कॉवा जे तू दे खबर यार दी
ते मै मोती चुगावा
गांवा  मै गांवा राग प्यार दे गांवा
छांवा  वे छांवा  तेरी जुल्फों दी छांवा
मै जिथे नज़र घुमावा बस तेनु ही पावा
चांवा वे चांवा बस हुन ऐ ही चांवा
इश्के दी तेरे बेल चढ़ावा
कॉवा वे कॉवा जे तू दे खबर यार दी
ते मै मोती चुगावा

जीना फजूल है


कर्म से बड़ा कुल  है
क्षमा से बड़ी भूल है
कैसा ये वसूल है
जीना फजूल है
रिश्ते दारी के कैसे ये स्कूल है
प्रवेश बस उनका है
जिनका मिलता खून है
न्यायलय मे उनकी बड़ी धूम है
जिनके यहाँ पैसा ही कानून है
बैठे है राजगदी पर
खाते मुरग मुसलम
जनता सुन्न है
और वो ही कहलवाते है
आज खुद को देश भक्त
असल मे जो राष्ट की घुन्न है
कर्म से बड़ा कुल  है
क्षमा से बड़ी भूल है
कैसा ये वसूल है
जीना फजूल है

ना कर

अर्श की तामीरदारी ना कर
तमंगो की खरीददारी ना कर
जादा होशयारी ना कर
खुवाबो की पहरेदारी ना कर

सपनों की चारदीवारी ना कर
मन को अपने पटवारी ना कर
हो सके तो सुधर
रिश्तो मे कालाबाजारी ना कर

पद की अपने गुरारी ना कर
बोझ बनके सवारी ना कर
हो सके तो निखर
समाज मे बीमारी ना कर

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

क्या कभी

क्यों तुने ये सोने के छत्र बनाए है
क्या कभी
झूठे बेर खाए है
अपने ही नाम की
लगाई है डुबकी
क्या कभी
संतो के पैर दबाए है
काटता है लकीरे
पढता है पौंथिया
क्या कभी
भूखो  के घर
चूलेह  जलाए  है
करता है दान
बनकर दानवीर
क्या कभी
अपाहिज परिंदों के
पर लगाए है
क्यों तुने ये सोने के छत्र बनाए है
क्या कभी
झूठे बेर खाए है
रोज चढ़ता है
नई सीढियाँ
क्या कभी
पीढ़ियों के
भ्रम मिटाए है
अपनी ही जय के
जो नारे लगाए है
क्या कभी
मरुस्थल मे फूल उगाए है
अपने ही नाम की
लगाई है डुबकी
क्या कभी
संतो के पैर दबाए है

स्वार्थ

मेरा ही स्वार्थ है,जो मै यहाँ खड़ा हूँ
कद तो बड़ा है,जरुरतो से जकड़ा हूँ
मार दू ठोकर,मनमोजी घड़ा हूँ
मेरा ही स्वार्थ है,जो मै यहाँ खड़ा हूँ
जानकर तो देखो,शकसियत मेरी
सितारों से जड़ा हूँ,
कद तो बड़ा है,जरुरतो से जकड़ा हूँ
झुक तो गया,फिर भी कहता है तू
क्यों अकड़ा हूँ
मार दू ठोकर,मनमोजी घड़ा हूँ
और क्या कहूँ,भरा पड़ा हूँ
मेरा ही स्वार्थ है,जो मै यहाँ खड़ा हूँ
कद तो बड़ा है,जरुरतो से जकड़ा हूँ
 

बुधवार, 12 जनवरी 2011

क्यों

अभी तो रोंदे थे सपने
फिर क्यों आस भरी  है
अभी तो तोडा था घरोंदा
फिर क्यों भीड़  खडी है
अभी तो छोड़ी थी रस्मे
फिर क्यों मांग  भरी है
अभी तो बोला था पत्थर
फिर क्यों आह भरी है
अभी तो काटे थे पंख
फिर क्यों उडान भरी है

जंग

उखाड़नी है तो उखाड़ो
पटरिया अलगाववाद  की
तोडनी है तो तोड़ो
रीढ़ की हड्डी आतकवाद की
आस्तीन के सापो की केचुली उधेड दो
रिश्वतखोरो के खिलाफ जंग छेड़ दो

तरक्की

प्याज के नखरे बड़े
अनाज सड़े पड़े पड़े
अर्थववस्था सुधर रही है
आम जनता चाहे रोज मरे
खेतो मै ना खाद है
नक्सलवाद की आग है
आरक्षण का फसाद है
साक्षरता बढ़ रही है
क्रांति का जौर है
तरक्की का शौर है
लिंग अनुपात है सही
कोख चाहे रोज उजड़े
सच  का टोटा है
लुटरो का कोठा है
इमारते बुलंद है
संसद के गुमंद है

मै तेरी

बेचने चली थी रुसवाई बाज़ार मे
पाई हैवानियत हर एक खरीददार मे
संभालती कैसे दिल चिथड़ो के हार मे
कैसे करती फर्क बेवफाई और प्यार मे
हर कोई जैसे बस जाना चाहता था
मै हूँ दीवाना , मै हूँ दीवाना
बस यही कहता था
लेता न था गम कोई
बस देना चाहता था
खोई थी मै अपने ही विचार मै
मिली खुद से तो एहसास हुआ
जैसे ही मैंने अपने दिल को छुआ
खिल उठा रुवा-रुवा
मेरी सदाओ ने रुख मोड़ दिया
जागी तो जग छोड़ दिया
अब तो तुम ही हो साँसों के फेरो मे
सुबहे के उजालो मे रातो के घेरो मे
मेरे कृष्ण अब
मै हूँ तेरी
तू ही शाम तू ही दुपहरी
लगाईं है तुने जो इसक कचेहरी
मै तेरी ,मै तेरी ,मै तेरी मै तेरी

दिल्ली


शाखे गुलाब दिल्ली
दिले भुलाव दिल्ली
आज फिर आँखों मे उभरी
तेरी याद दिल्ली
गुलिश्ता है
फ़रिश्ता है
बसती जहन मे
आहिश्ता आहिश्ता है
तेरे रास्ते दिल्ली
जीने के वास्ते दिल्ली
आज भी खुले है
साँसों मे घुले है
बड़ी रुबाब दिल्ली
कामयाब दिल्ली
रंगे गुलाल दिल्ली
ढंगे जुबान दिल्ली
आज भी है जहाँ पर
तेरी कमान दिल्ली
महोबते अरमान दिल्ली
सोह्बते फरमान दिल्ली
आज भी घुमाए है
तेरे खुवाब दिल्ली
शाखे गुलाब दिल्ली
दिले भुलाव दिल्ली
आज फिर आँखों मे उभरी
तेरी याद दिल्ली

भेढ़ो की खाल


ढाक के पात से,
सपने की खाट से
रोज निकलता हूँ दीमक,अपने जज्बात से
लोटे की पैदी को,मन के छेदी को
रोज सुनाता हूँ यादे,घर के भेदी को
जात के सवाल पर,घात के झामाल पर
जाने कैसे कर लेता हूँ भरोसा ,भेढ़ो की खाल पर
लोहे के चने को,शीशे के तने को
रोज बहाता हूँ नैनो से
दर्दे घनो को

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

तराजू

अब तो तराजू थाम ली
जाने किसका पलड़ा भारी हो
किस तरफ फूल मिले
किस तरफ आरी हो
किस तरफ यार मिले
किस तरफ गद्दारी हो
अब तो तराजू थाम ली
जाने किसका पलड़ा भारी हो
किस तरफ खरीददार बने
किस तरफ बाजारू हो
किस तरफ सवार बने
किस तरफ सवारी हो
अब तो तराजू थाम ली
जाने किसका पलड़ा भारी हो

आजादी

कौन कहता है
हमने आजादी पा ली है
घुटनों के बल चलते है
हिम्मत  बिकवाली है
स्वीधान मे करते संसोधन वो
जिनके मगज खाली है
और जिनकी कोठी है स्विजलैंड मे
वो हिंद ऐ चमन के माली है
कैसे करु नमन तुमको  ऐ राजनेताओ
जब तुमारे नाम के आगे और पीछे गाली है
किस का पेट भरेगे ये भूखे कागभगोड़े
जब कवों ने जेबों मे बोरी सिलवाली है
सुना है बचपन
सुनी आगनवाडी  है
कहा दीखेगा कुपोषण
जब नेताजी के बच्चे लाला -लाली है
कौन कहता है
हमने आजादी पा ली है
घुटनों के बल चलते है
हिम्मत  बिकवाली है

राम मिले

समर्पण के प्रमाण मे
प्रण की छाव मिले
तपते मन मे आज भी
अलाव मिले
कर तो लु मै बुत परस्ती
कही तो कोई राम मिले
इंसानियत का कही जमाव मिले
जो कर दे पार ऐसी नाव मिले
थकते तन को आज भी
सवाल  मिले
 कर तो लु मै बुत परस्ती
कही तो कोई राम मिले

सोमवार, 10 जनवरी 2011

दासी

चरणों मे तेरे मै दासी हो गई
नजरो की तेरी मै पियासी हो गई
थाम ले मोहे घनशयाम मेरे
अब तो मै रूवासी हो गई
झलक को तेरी तरसने लगी
तेरे ही तरफ सरकने लगी
घुन्गरुओ की तेरे जुबा सी हो गई
मुरली की धुन मै धूआ सी हो गई
थाम ले मोहे घनशयाम मेरे
अब तो मै रूवासी हो गई
बाते तेरी दुवा सी हो गई
जिंदिगी जैसे जुआ सी हो गई
तू ही है प्रियतम आ देख मुझे
मै भी आज पिया सी हो गई
चरणों मे तेरे मै दासी हो गई
नजरो की तेरी मै पियासी हो गई

मन पीर

ह्रदय गरल उतार रहा हूँ नभो के पाले मे
शुधाक्षीर उबाल रहा हूँ रातो के उजालो मे
तपती धरा के अधरों पर रुककर
सागर उधाड रहा हूँ मय के प्यालो  मे
भजंगो के दुवंद मे फसकर
घटाओ के कुर्दन मे हँसकर
समय तेरे व्यूह  मे भटक कर
हकुमते सभाल रहा हूँ वीराने मे
आशाओ को झटक कर
दर-दर सर पटक कर
मन पीर उछाल रहा हूँ तोहमत खाने मे

रविवार, 9 जनवरी 2011

युगातीत


युगातीत हूँ कालातीत हूँ
रख स्मरण  पार्थ मुझे
मै ही अतीत हूँ
युगांधर हूँ पुरान्धर हूँ
मै ही धुरान्धर हूँ
आवर्त हूँ पुनावर्त हूँ
मै ही सामर्थ हूँ
सत्य हूँ  ज्ञान  हूँ
मै ही प्राण हूँ
जीत हूँ रीत हूँ प्रीत हूँ
युगातीत हूँ कालातीत हूँ
रख स्मरण पार्थ मुझे
मै ही अतीत हूँ

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

उठा

वक़्त के निर्भर  ना हो,दिल कोई खुवाइश उठा
बंद कर ले खताए,नई कोई आजमाइश उठा
चल बढ़ कदम रख,अपनी फरमाइश बता
तेरा ही है चमन , एक बार तो जता
वक़्त के निर्भर  ना हो,दिल कोई खुवाइश उठा
गुजर जा काफिला बनकर , तम्बूओ को उठा
चल बढ़ कदम रख, अपनी पैदाइश बता
तू भी है अंश खुदा का , एक बार तो जता
बंद कर ले खताए,नई कोई आजमाइश उठा
मिटा दे सलवटे , कुलाड़ी उठा
काट दे बंदिशे नई कोई गुजारिश उठा
तेरा ही है चमन , एक बार तो जता
वक़्त के निर्भर  ना हो,दिल कोई खुवाइश उठा
बंद कर ले खताए,नई कोई आजमाइश उठा

होशियार

होशियार ऐ हवा के मै आ रहा हूँ
होशियार ऐ गगन के मै गा रहा हूँ
तड़ित जरा संभल
देख तो चमक मेरी
तारो को मै ही चमका रहा हूँ
और जो तुज्को गरूर है फिजा
तो तू भी देख ले
मै मौन हो कर भी
गुनगुना रहा हूँ

मंजुमन

मंजुमन बना ख़त का
तो वक़्त न मिला
और जब मिला वक़्त
तेरा ख़त ना मिला
दुरी तो नाप लेता
पल भर मे
मगर रास्तो मे
फरक ना मिला

महोबत के ताले

जुबा पे मेरी, महोबत के ताले
कौन संभाले दिल, कौन संभाले
चाह मे तेरी, खड़े है मतवाले
कैसे, अपने अरमान निकाले
जुल्फे तेरी, बादल काले
चखा दे हमे , इसक निवाले
कौन संभाले दिल, कौन संभाले
आँखों मे मेरी, अपने सपने बुनाले
कौन संभाले दिल, कौन संभाले
सुन ले अब तो, मेरे नाले
तुने ही उठाए है, जिगर मे छाले
कैसे अपने, अरमान निकाले
जुल्फे तेरी, बादल काले
कैसे तुझे, दिल से निकाले
जब तू ही,  डाका डाले
जुबा पे मेरी , महोबत के ताले
कौन संभाले दिल, कौन संभाले

फिर आऊंगा

रमते रमते , रम जाऊंगा
मै  वक़्त नहीं , जो थम जाऊंगा
कम खाऊंगा
गम खाऊंगा
डगमगया हूँ , संभल जाऊंगा
गर्दिश , तू जितना जौर लगा
मै नभ नहीं जो , बिखर जाऊंगा
चल जाऊंगा
पल जाऊंगा
गिरा हूँ , उठ जाऊंगा
काल , तू जितना मुह फेला
मै धरा नही , जो कपकपाउंगा
लुट जाऊंगा
घुट जाऊंगा
मरा हूँ , फिर आऊंगा
 

हसरते

हसरते गर पूरी हो जाए इंसा की
तो वो मांग ले खुदाई भी खुदा की
पूछी न किसी ने मज़बूरी फिजा की
आती है बारी मौसमे खिजा की
खुश थे सब जब तक  घडी थी मिलन की
रोया ना कोई जब आई बारी विदा की
किस से करे गिला संजय
जब बदलने की फितरत है जहाँ की

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

चुनाव

बुना है बूंदों को सागर पाने को
चुना है जुगनुओ को गगन जगमगाने को
तराशा है  होसलो को बुलंद हो जाने को
रखा है कदम छा जाने को
खोजा है खुद को समर्थन पाने को
चुनी है राह अनुसरण कराने  को
नापा है कद विकराल हो जाने को
पिया है जहर अमर हो जाने को
छेड़ी है ताल गुनगुनाने को
उतरा हूँ मैदान मे जीत जाने को
बुना है बूंदों को सागर पाने को
चुना है जुगनुओ को गगन जगमगाने को

बुधवार, 5 जनवरी 2011

चाहत


चाहता हूँ बाँधना , दारिया तेरी लहरों को
चाहता हूँ पीना , समय तेरे पहरों को
और कर लेने चाहता हूँ , जब्त खुद में
खुदा तेरे कहरो को
चाहता हूँ खिलाना , मायुस चेहरो को
चाहता हूँ मिलाना , मानसिकता के दायेरो को
और कर लेने चाहता हूँ , जब्त खुद में
खुदा तेरे जहरो को

क्यों


क्यों लेती हो नाम मेरा , दिल बहलाने को
क्यों चलती हो काटो पे , अरमान जलाने को
क्यों धोती हो हाथ मेरे , दाग छुढाने को
क्यों फेलाती हो दामन, सर छुपाने को
गफलत मे जीने दो , जिंदिगी चार दिन
कभी तो बद्लेगे, बेजार दिन
छुती हो दिल क्यों , जख्म मचलाने को
क्यों आती हो पास मेरे , खुद को जलाने को
ताबूत की कीलो से , आशियाँ बनाओ
मुश्किल में मेरी , खुद को ना मिलाओ
क्यों जाती हो दर- दर , ठोकरे खाने को
क्यों थामती हो मुझको , किश्मत आजमाने को
 क्यों चलती हो काटो पे , अरमान जलाने को
क्यों धोती हो हाथ मेरे , दाग छुढाने को
क्यों बुनती हो बूंदों को सागर पाने को
क्यों खोदती हो मुझको , खुद में समा जाने को
क्यों फेलाती हो दामन, सर छुपाने को
क्यों लेती हो नाम मेरा , दिल बहलाने को
क्यों चलती हो काटो पे , अरमान जलाने को


सोमवार, 3 जनवरी 2011

ये साली जिंदिगी

ये साली जिंदिगी
बड़ी काली जिंदिगी
बह जाए रेत सी
भोली भाली जिंदिगी
रंग दे जिंदिगी
ढंग  दे जिंदिगी
जाने कितने बेढंग दे जिंदिगी
ये साली जिंदिगी
बड़ी काली जिंदिगी
गड़बड़ झालो की
हरामी सालो की
फाड़ दे जिंदिगी
गाड़ दे जिंदिगी
बह जाए रेत सी
भोली भाली जिंदिगी
तोड़ दे जिंदिगी
मरोड़ दे जिंदिगी
जो मांगे तुजे
उसको छोड़ दे जिंदिगी
ये साली जिंदिगी
बड़ी काली जिंदिगी

कलम की तलहटी

रोज बने नया फ़साना
कलम की तलहटी मे
तारो को छुना
समंदर को पी जाना
उड़ना बिन पंखो के
छितिज़ नया पाना
कलम की तलहटी मे
कभी हसाना कभी रुलाना
कभी खुद को भूल जाना
कलम की तलहटी मे
कभी चुभाना फूलो को
कभी काँटों को सजाना
कभी उदय करना सूरज
कभी चाँद को डुबाना
रोज बने नया फ़साना
कलम की तलहटी मे
कभी खोलना मुट्ठिया
कभी पलकों को झुकाना
कभी करना तोबा
कभी मयखाना
कभी बिछाना शतरंज
कभी गुलाल उडाना
रोज बने नया फ़साना
कलम की तलहटी मे