मेरे बारे में

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

राहे

चौराहे जिंदिगी के हर मौड़ पे खड़े है
बहुत है भीड़ वहा जहा कदम पड़े है
गिर तो जाता कब का
मगर क्या करू होसले बड़े है
बस यही अरमा
अब दिल में चढ़े है
चलते ही जाना
कदम बढे तो कदम बढे है
कहो तो कहो
मधहोश मुझे
ये सरुर जब चढ़े है
तो बस चढ़े  है
रोकेगा कौन रफ़्तार तेरी
जब रास्ते तुने खुद ही जड़े है
खोल कर तो देख
राहे तेरी
चलने से पहले मंजिल पड़े है