दवा पानी और सुरक्षा पिंजरे की दिवाराे में
दासाे का जीवन गुज़रा हमेशा तहखानाे में
कभी जाे टांगा खुटी पर पहुँचे आँसमानाे में
नज़र टिकी थी फिर भी मुफ़्त के दानाे में
कैसा क्षितिज कैसे पंख सब से अनजान हुएे
बंद रहे पिजरे में लेकिन फिर भी हम महान हुएे
जद्दोजहद से छुटा पिन्ड चाहे जितने लाचार हुएे
देखमदेखी काँठ का उल्लु सारा बाज़ार हुएे
दवा पानी और सुरक्षा पिंजरे की दिवाराे में
दासाे का जीवन गुज़रा हमेशा तहखानाे में
**-** SANJAY KUMAR RATHI **-**