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क्षमताओ का आकाश विषम गहरा है
याेग्यताओ के प्रकाश पर पहरा है
तब तक ही है सड़न आेर काई
जब तक मन का पानी ठहरा है
एक सी क़दकाठी एक सा चेहरा है
उस पर बाँधा सबने सेहरा है
तब तक ही है शय और मात
जब तक घात और माेहरा है
**÷÷SANJAY KUMAR RATHI÷÷**