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बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

* ये कविता सिर्फ़ क़र्ज़दारों के लिए लागु है

तिलाे में अब तेल नहीं तुम्हारे

बस तुम नाैकरी बजातै हाे 


साहब कहते दिन रात काे

तुम भी दिन बतलाते हाे


तन्खाह पुरे बारह लाख

पर रुखी सुखी खाते हाे


तिलाे में अब तेल नहीं तुम्हारे

बस तुम नाैकरी बजातै हाे 


किस्त में जीते पुरे साल

पुरे साल किस्त चुकाते हाे


साहब कहते दिन रात काे

तुम भी दिन बतलाते हाे


जिसकाे जाे भी कहना हाे

कह ले


पर तुम ताे बटर लगाते हाे

तिलाे में अब तेल नहीं तुम्हारे


बस तुम नाैकरी बचातै हाे


**÷÷SANJAY KUMAR RATHI÷÷**