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गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

पोटली

दे पैगाम कोई खुशी का तो उसको दुवा मिले
जो मांगे कतरा उसको जहाँ मिले

लेकर यादो की पोटली हम बाजार चले
सोचा कुछ तो दाम मिले
जो थी धुंधली उनको छाट लिया
और जो थी बेशकीमती उनको बाट लिया
जेब थी तंग आज दंग हो गई
जिंदिगी भी जैसे एक पतंग हो गई
शाम की खुमारी दिल पे छाने लगी
आँखे भी अब मुरझाने लगी
सोचा समेटे फिर से दिल के जालो को
और फिर बिछा दिया जमी पर अपने अरमानो को
यादे जो बिकी थी वो फिर चार हो गई
मेरी पोटली पूरा बाज़ार हो गई