दे पैगाम कोई खुशी का तो उसको दुवा मिले
जो मांगे कतरा उसको जहाँ मिले
लेकर यादो की पोटली हम बाजार चले
सोचा कुछ तो दाम मिले
जो थी धुंधली उनको छाट लिया
और जो थी बेशकीमती उनको बाट लिया
जेब थी तंग आज दंग हो गई
जिंदिगी भी जैसे एक पतंग हो गई
शाम की खुमारी दिल पे छाने लगी
आँखे भी अब मुरझाने लगी
सोचा समेटे फिर से दिल के जालो को
और फिर बिछा दिया जमी पर अपने अरमानो को
यादे जो बिकी थी वो फिर चार हो गई
मेरी पोटली पूरा बाज़ार हो गई
Sanjay Kumar Rathi