चले चाल किश्मत नई रोज उसको हराने को
मगर क्या कभी रोक पाया है दरिया जोश भरे दीवानो को
सुलगते अरमानो को
दहकते फरमानों को
कैसे भुला सकता है कोई किसी के अहशनो को
सतरंगी सपनो को
धोकेबाज अपनों को
जाने क्यों सहलाता है इंसा रोज अपने जख्मो को
यादो की बारात को
दुवाओ की खेरात को
जाने क्यों चुभा लेता है दिल मै किसी की बात को
नमक हरामी को
अपनी नाकामी को
कइसे छुपा लेता है कोई अपनी गलतफहमी को
Sanjay Kumar Rathi